बुधवार, 19 सितंबर 2018

आधुनिक युग का तेरापंथ धर्म संघ —एक परिचय

तेरापंथ धर्मसंघ जैनधर्म के श्वेताम्बर परम्परा के अनुरूप चलने वाला धर्मसंघ है ! तेरापंथ धर्मसंघ आचार्य भिक्षु द्वारा स्थापित अध्यात्म प्रधान धर्मसंघ है ! यह जैन धर्म की शाश्वत प्रवहमान धारा का युग-धर्म के रूप में स्थापित एक अर्वाचीन संगठन है, जिसका इतिहास लगभग 250 वर्ष पुराना है। वर्तमान के आधुनिक युग में जहा अनुशासन एक महत्वपूर्ण चुनोती है वहा तेरापंथ धर्मसंघ के अनुशासन के रूप में एक मिशाल है ! जिसमे  साधू ,  साध्वीजी , समण व्  समणी जी   एक आचार्य के निर्देशानुसार विहार व् चातुर्मास करते है ! तेरापंथ जैन धर्म का एक अत्यंत तेजस्वी और सक्षम संप्रदाय है। आचार्य भिक्षु इसके प्रथम आचार्य थे। इसके बाद क्रमश: दस आचार्य हुए। इसे अनन्य ओजस्विता प्रदान की चतुर्थ आचार्य जयाचार्य ने और नए-नए आयामों से उन्नति के शिखर पर ले जाने का कार्य किया नौवें आचार्य श्री तुलसी ने। उन्होंने अनेक क्रांतिकारी कदम उठाकर इसे सभी जैन संप्रदायों में एक वर्चस्वी संप्रदाय बना दिया। दशवें आचार्य श्री महाप्रज्ञ ने इस धर्मसंघ को विश्व क्षितिज पर प्रतिष्ठित किया और ग्यारहवें आचार्य श्री महाश्रमण इसे व्यापक फलक प्रदान कर जन-मानस पर प्रतिष्ठित कर रहे हैं। तेरापंथ का अपना संगठन है, अपना अनुशासन है, अपनी मर्यादा है। इसके प्रति संघ के सभी सदस्य सर्वात्मना समर्पित हैं। साधु–साध्वियों की व्यवस्था का संपूर्ण प्रभार आचार्य के हाथ में होता है। आचार्य भिक्षु से लेकर आचार्य श्री महाश्रमण  तक सभी आचार्यों ने साधु–साध्वियों के लिए विविधमुखी मर्यादाओं का निर्माण किया है। चतुर्विध धर्मसंघ अर्थात साधु-साध्वियों व श्रावक-श्राविकाओं की चर्या ही इसकी प्राणवत्ता है। आधुनिक युग की सबसे बड़ी समस्या को आचार्य श्री तुलसी ने अपनी दूरद्रष्टि से देखते हुए अणुव्रत आन्दोलन का सूत्रपात किया अणुव्रत का प्रारंभ आचार्य तुलसी (तेरापंथ धर्म संघ के नोवें आचार्य) द्वारा 1 मार्च 1949 में राजस्थान के सरदारशहर कस्बे में हुआ। उस समय एक और देश सांप्रदायिक ज्वाला में जल रहा था, वहां दूसरी और सभी प्रमुख लोग देश के भौतिक निर्माण में विशेष अभिरूचि ले रहे थे | अणुव्रत आन्दोलन ने सांप्रदायिक सौहार्द के लिए सभी धर्म-सम्प्रदाय के प्रमुख -पुरुषों को एक मंच पर लाकर यह समझाने की कौशिश की गयी कि धर्म के मौलिक सिदांत एक हैं। जो भिन्नता दिखाई दे रही है वह या तो एकांत आग्रह कि देन है या फिर सांप्रदायिक स्वार्थों के कारण उसे उभरा जा रहा है। इस द्रष्टि से विशाल सर्व धर्म सदभाव सम्मलेन आयोजित किये गए और अणुव्रत का मंच एक सर्वधर्म सदभाव का प्रतिक बन गया। भारतीय धर्म सम्प्रदायों के अतिरिक्त इसाई तथा मुसलमान सम्प्रदायों के साथ भी एक सार्थक संवाद बना और अनेक ईसाई तथा मुसलमान लोगों ने भी अणुव्रत के प्रचार-प्रसार में रूचि दिखाई। आज आधुनिक युग की सबसे बड़ी समस्या का अणुव्रत आन्दोलन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है ! सिर्फ हिंदुस्तान में ही नही विदेशो में भी अणुव्रत आन्दोलन के समर्थन चिंतन होने लगा है ! संक्षिप्त में कहा जाये तेरापंथ धर्मसंघ आधुनिक युग की समस्या व् विचारो पर मंथन करने वाला धर्मसंघ है ------ उत्तम जैन (विद्रोही )

सोमवार, 17 सितंबर 2018

नरेन्द्र मोदी जीवनी



                              नरेन्द्र मोदी जीवनी - Biography of Narendra Modi

नाम         –  नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
जन्म        –   17 सितम्बर 1950 वडनगर, जि. मेहसाना (गुजरात)
पिता        –   दामोदरदास मूलचंद मोदीमाता        –   हीराबेन मोदी 
पत्नी        –   जशोदाबेन के साथ

नरेन्द्र मोदी / Narendra Modi का राजनीती को समर्पित जीवन

नरेन्द्र मोदी जी ने अपना पूरा जीवन 1971 में RSS join करने के बाद राजनीती को ही समर्पित किया. 1975-77 में जब राजनितिक झगडे चल रहे थे तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी में राज्यों में आपातकाल घोषित किया और RSS जैसी संघटनाओ को बंद करने कहा. तब नरेन्द्र मोदी ने गुप्त रूप से एक पुस्तक लिखी जिसका नाम “संघर्ष माँ गुजरात”, जिसमे उन्होंने गुजरात के राजनीती को वर्णित किया था 
नरेन्द्र मोदी / Narendra Modi का प्रधानमंत्री नियुक्त होना
जून 2013 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की और से मोदी को प्रधानमंत्री उम्मेदवार घोषित किया गया. जहा कई लोगो ने पहले से ही उन्हें भारत का प्रधानमंत्री मान लिया था. क्यों की कई लोगो का मानना था की मोदी में भारत की आर्थिक स्थिति बदलने का और भारत का विकास करने की ताकत है और अंत में मई 2014 में उन्होंने और उनकी बीजेपी पार्टी में लोकसभा चुनाव में 534 में से 282 सीट प्राप्त कर एतिहासिक जीत दर्ज की.
आरंभिक जीवन:----- 
        नरेन्द्र मोदी  का जन्म 17 सितंबर 1950 में वदनगर मेहसाणा जिल्ला में हुआ. नरेन्द्र मोदी के पिता का नाम दामोदर दास मूलचंद एवम माता का नाम हीरा बेन हैं. नरेन्द्र मोदी  के पिता बहुत साधारण तेलीय जाति के व्यक्ति थे, जिनके 6 संताने थी जिनमें से एक नरेन्द्र मोदी  था. नरेन्द्र मोदी अपने पिता के साथ  रेलवे स्टेशन पर चाय का स्टाल लगाते थे. इनकी पढाई में बहुत रूचि नहीं थी, पर इनके शिक्षक के अनुसार वे कुशल वक्ता थे.वाद-विवाद में नरेंद्र मोदी को कोई पकड़ नहीं सकता था. मोदी जी ने वडनगर से स्कूल की पढाई पूरी की, व् राजनीती विज्ञान में ग्रेजुएशन किया. बचपन से ही मोदी जी को देश के प्रति प्रेम था, उन्होंने 8 साल की उम्र में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में अपना पंजीकरण करा लिया था, ये एक शक्तिशाली हिन्दू राष्ट्रवादी समूह है, जो भारत के संविधान की बातों के खिलाफ धर्मनिरपेक्षता नहीं चाहता था, वो समस्त देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता था. हिंदुत्व की ये बात बीजेपी की जड़ है.

        नरेन्द्र जब विश्वविद्यालय के छात्र थे तभी से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में नियमित जाने लगे थे. इस प्रकार उनका जीवन संघ के एक निष्ठावान प्रचारक के रूप में प्रारम्भ हुआ. उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी और भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी. गुजरात में शंकरसिंह वाघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की ही रणनीति थी.

        इससे पूर्व वे गुजरात राज्य के १४वें मुख्यमन्त्री रहे. उन्हें उनके काम के कारण गुजरात की जनता ने लगातार ४ बार (२००१ से २०१४ तक) मुख्यमन्त्री चुना. गुजरात विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त नरेन्द्र मोदी विकास पुरुष के नाम से जाने जाते हैं और वर्तमान समय में देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से हैं. माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर भी वे सबसे ज्यादा फॉलोअर वाले भारतीय नेता हैं. टाइम पत्रिका ने मोदी को पर्सन ऑफ़ द ईयर २०१३ के ४२ उम्मीदवारों की सूची में शामिल किया है.
       
        2014 में नरेन्द्र मोदी  ने देश में एक क्रांति की तरह जीत को हासिल किया, जिसका श्रेय उनके कठिन परिश्रम  और अनुभव को जाता हैं . नरेन्द्र मोदी   technology से काफी प्रभावित हैं नरेन्द्र मोदी  के सभी काम सोचे समझे, और पहले से प्लान किये हुए होते हैं. ये इस सदी के महानायक हैं. एक target fix करके काम करना ही नरेन्द्र मोदी  का सबसे बड़ा गुण हैं. जिससे सभी को सीखने की जरुरत हैं.

बचपन:

        पिता दामोदर दास मोदी और माँ हीराबेन के 6 बच्चों में से ये तीसरे नंबर के थे. इनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी. माँ दूसरों के घर में जाकर बर्तन साफ़ करती थी और पिता की एक छोटी सी चाय की दुकान थी. एक कच्चे मकान में पूरा परिवार रहता था. गरीबी के कारण दो वक्त का खाना भी सही से नसीब नहीं होता था. संघर्ष भरे माहौल में मोदी जी ने बहुत छोटी उम्र में ही जीवन के कई ऊँचे नीचे पड़ाव देख लिए थे. बचपन से ही इनको पढाई लिखाई का बेहद शौक था.  ये बचपन से ही स्वामी विवेकानंद एवं उनके विचारों को अपना आदर्श मानते थे. 13 वर्ष की आयु में नरेन्द्र की सगाई जसोदा बेन चमनलाल के साथ कर दी गयी. लेकिन कुछ पारिवारिक समस्याओं के कारण 1967 में मात्र 17 वर्ष की उम्र में ही ये घर छोड़ कर चले गए. ये घर छोड़कर उत्तरी भारत में स्थित स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित हिन्दू आश्रम एवं कोलकाता के बेलूर मठ ऐसे ही कई आश्रामों का भृमण करने लगे. इन्हीं दिनों में इन्होंने जीवन को गहराई से जाना अपनी सोच को सुधारा और करीब 2 साल बाद फिर से वापस घर आ गए. इसके बाद मोदी जी आर.एस.एस. (R.S.S.) के सदस्य बने और पूरी मेहनत से आर.एस.एस. के लिए काम करने लगे. इतनी व्यस्तता के बावजूद मोदी जी पढाई करना नहीं छोड़ा और राजनीति विज्ञान में डिग्री प्राप्त की. वो दिन रात लोगों की सेवा करते लोगों से जुड़ते और उनकी समस्या को करीब से जानने की कोशिश करते.

गुजरात में कार्य:

        2001 में गुजरात में भयानक भूकंप आया और पूरे गुजरात में भारी विनाश हुआ. गुजरात सरकार के राहत कार्य से ना खुश होकर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने Narendra Modi को गुजरात का मुख्यमंत्री बना दिया. मोदी ने काफी कुशलता से राहत कार्य संभाला और गुजरात को फिर से मज़बूत किया. मोदी ने गुजरात को भारत का सबसे बेहतरीन राज्य बना दिया. उन्होंने गाँव गाँव तक बिजली पहुँचाई. देश में पहली बार किसी राज्य की सभी नदियों को जोड़ा गया जिससे पूरे राज्य में पानी की कमी दूर हुई. एशिया के सबसे बड़े सोलर पार्क का निर्माण गुजरात में हुआ. गुजरात के सभी गाँवों को इंटरनेट से जोड़ा गया और टूरिज़्म को भी बढ़ावा दिया गया. मोदी के कार्यकाल में गुजरात में बेरोज़गारी काफी कम हुई और महिलाओं की सुरक्षा में काफी मज़बूती आई. इन्ही कारणों की वजह से गुजरात की जनता ने मोदी को चार बार लगातार अपना मुख्यमंत्री नियुक्त किया.

        प्रधानमंत्री बनने के बाद वे भारत का कुशलता से नेतृत्व कर रहे हैं और भारत को नई उचाईओं पर पहुँचा रहे हैं. उन्होंने कई विदेश यात्राएँ की और भारत की छवि संपूर्ण विश्व में मज़बूत की. इसी कारण विदेशों द्वारा भारत में काफी निवेश हुआ. मोदी ने पड़ोसी देशों से भी काफी अच्छे संबंध बनाए. मोदी ने जन धन योजना, स्वच्छ भारत अभियान, मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी कई योजनाओं की शुरुआत की जिससे भरत में काफी विकास हो रहा है.

गुजरात विकास योजनाएँ:
• पंचामृत योजना                -         राज्य के एकीकृत विकास की पंचायामी योजना,
• सुजलाम् सुफलाम्             -         राज्य में जलस्रोतों का उचित व समेकित उपयोग, जिससे जल की  
                                          बर्बादी को   रोका जा सके,
• कृषि महोत्सव                  –        उपजाऊ भूमि के लिये शोध प्रयोगशालाएँ,
• चिरंजीवी योजना                –        नवजात शिशु की मृत्युदर में कमी लाने हेतु,
• मातृ-वन्दना                    –         जच्चा-बच्चा के स्वास्थ्य की रक्षा हेतु,
• बेटी बचाओ                    –         भ्रूण-हत्या व लिंगानुपात पर अंकुश हेतु,
• ज्योतिग्राम योजना               –        प्रत्येक गाँव में बिजली पहुँचाने हेतु,
• कर्मयोगी अभियान                      सरकारी कर्मचारियों में अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा जगाने हेतु,
• कन्या कलावाणी योजना         –        महिला साक्षरता व शिक्षा के प्रति जागरुकता,
• बालभोग योजना                 –        निर्धन छात्रों को विद्यालय में दोपहर का भोजन,

        नरेन्द्र मोदी ने 26 मई 2014 को भारत के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री हैं जिनका जन्म आजादी के बाद हुआ है. मई 2014 में अपना पद संभालने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी चहुंमुखी और समावेशी विकास की यात्रा पर निकल पड़े हैं जहां हर भारतीय अपनी आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा कर सके. पहली बार प्रधानमंत्री जन-धन योजना के माध्यम से अभूतपूर्व बदलाव आया है जिसके अंतर्गत यह सुनिश्चित किया गया है कि देश के सभी नागरिक वित्तीय तंत्र में शामिल हों. कारोबार को आसान बनाने के अपने लक्ष्य को केंद्र में रखकर ‘मेक इन इंडिया’ के उनके आह्वान से निवेशकों और उद्यमियों में अभूतपूर्व उत्साह और उद्यमिता के भाव का संचार हुआ है. ‘श्रमेव जयते’ पहल के अंतर्गत श्रम सुधारों और श्रम की गरिमा से लघु और मध्यम उद्योगों में लगे अनेक श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ है और देश के कुशल युवाओं को भी प्रेरणा मिली है. पहली बार भारत सरकार ने भारत के लोगों के लिए तीन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की शुरुआत की और साथ-ही-साथ बुजुर्गों को पेंशन एवं गरीबों को बीमा सुरक्षा देने पर भी ध्यान केंद्रित किया है. जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया बनाने के उद्देश्य से डिजिटल इंडिया मिशन की शुरुआत की ताकि प्रौद्योगिकी की मदद से लोगों के जीवन में बेहतर बदलाव लाए जा सकें. 2 अक्टूबर 2014 को महात्मा गांधी की जयंती पर प्रधानमंत्री ने ‘स्वच्छ भारत मिशन - देशभर में स्वच्छता के लिए एक जन-आंदोलन’ की शुरुआत की.

राजनैतिक जीवन:
        जून 2013 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की और से मोदी को प्रधानमंत्री उम्मेदवार घोषित किया गया. जहा कई लोगो ने पहले से ही उन्हें भारत का प्रधानमंत्री मान लिया था. क्यों की कई लोगो का मानना था की मोदी में भारत की आर्थिक स्थिति बदलने का और भारत का विकास करने की ताकत है और अंत में मई 2014 में उन्होंने और उनकी बीजेपी पार्टी में लोकसभा चुनाव में 534 में से 282 सीट प्राप्त कर इतिहासिक जीत दर्ज की. और इसी जीत के साथ उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को हराया, जो पिछले 60 सालो से भारतीय राजनीती को संभाल रही थी. और भारतीय जनता ने उस समय दिखा दिया था के वे उस समय मोदी के रूप में भारत में बदलाव लाना चाहते थे. 1987 में नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए, बीजेपी में वे दिन ब दिन आगे बढ़ते गए और सामाजिक हितो के कई काम उन्होंने बीजेपी में रहकर किये. उन्होंने Business के Privatisation, छोटे Business को बढ़ावा दिया. 1995 में मोदी राष्ट्रीय मंत्री के रूप ने नियुक्त हुए, 1998 के चुनाव में बीजेपी को आगे बढ़ाने में उनका सबसे बड़ा हात था. फेबुअरी 2002 में जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सेवा कर रहे थे. आने जाने वाली ट्रेन पर किसी ने अटैक किया, जो कथित रूप से मुस्लिमो ने किया था. और बदले के प्रतीशोध/ इरादे से गुलबर्ग के मुस्लिमो पर भी हमला किया गया. इस तरह हिंसा बढती गयी इस वजह से मोदी सरकार को उस समय कर्फ्यू की घोषणा करनी पड़ी. कुछ समय बाद दोनों ही समुदाय में शांति की स्थिति आई और तब मोदी सरकार की कई लोगो ने पुरे देश में आलोचना की क्यू की उस हमले में 1000 से भी ज्यादा मुस्लिम मारे गए थे. मोदी के विरुद्ध 2 जांच कमिटी गठित करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने पाया की मोदी के विरुद्ध कोई गवाह नहीं है जिस से उन्हें दोषी ठहरा सके.

बुधवार, 5 सितंबर 2018

जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य श्री महाश्रमण जी

                                                                 जय जय ज्योति चरण
                                                                 जय जय महाश्रमण


'जिस देश में गंगा बहती है' उस देश के वासी होने का हमारा गर्वबोध उस समय चकनाचूर हो जाता है, जब हमारा अपने आसपास के परिवेश में आए दिन वैमनस्य, हिंसा, भ्रष्टाचार, अनैतिकता, सांप्रदायिक उन्माद आदि की घटनाओं से वास्ता पड़ता है। भ्रष्टाचार, घृणा और नशाखोरी के जख्मों से त्रस्त हमारे देश और समाज में अहिंसा, नैतिकता, सद्भावना, सांप्रदायिक सौहार्द और भाईचारे की अलख जगाने के लिए देश व विदेश मे अहिंसा यात्रा द्वारा अलख जगाने वाले आचार्य महाश्रमण जी का सक्षिप्त जीवन परिचय ------
भारत की गौरवशाली अध्यात्म परंपरा में श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ का अपना एक विशिष्ट स्थान है। इस धर्म संघ के वर्तमान अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण अपने उपदेशों के आलोक से प्रतिदिन सैंकड़ों लोगों के जीवन के रूपांतरण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ के मार्गदर्शन से आलोकित आपके व्यक्तित्व की आभा से समाज अभिभूत है। आपके उपदेंशो की ऊष्मा से हजारों लोगों के जीवन की दशा और दिशा परिवर्तित हुई है। ऐसे ऊर्जावान संत महायोगी महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी मानवता के लिए समर्पित जैन तेरापंथ के उज्जवल भविष्य है। अणुव्रत आंदोलन के प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी की उन्होंने अनन्य सेवा की। तुलसी-महाप्रज्ञ जैसे सक्षम महापुरूषों द्वारा वे तरासे गये है।वे अल्पभाषी है।९ सितंबर १९८९ को महाश्रमण पद पर आरूढ़ एवं जन्ममात प्रतिभा के धनी आचार्य महाश्रमण अपने चिंतन को निर्णय व परिणाम तक पहुंचाने में बडे सिद्धहस्त हैं। महाश्रमण उम्र से युवा है, उनकी सोच गंभीर है युक्ति पैनी है, दृष्टि सूक्ष्म है, चिंतन प्रोढ़ है तथा वे कठोर परिश्रमी है। उनकी प्रवचन शैली दिल को छूने वाली है। आचार्य श्री की प्रज्ञा एवं प्रशासनिक सूझबूझ बेजोड़ है। गौर वर्ण, आकर्षक मुखमंडल, सहज मुस्कान से परिपूर्ण बाह्म व्यक्तित्व एवं आंतरिक पवित्रता, विनम्रता, दृढ़ता, शालीनता व सहज जैसे गुणों से ओतः प्रोत आचार्य महाश्रमण से न केवल तेरापंथ अपितु पूरा धार्मिक जगत्‌ आशा भरी नजरों से निहार रहा है और उनकी महानता को स्वीकार कर रहा है। तेरापंथ धर्म संघ के 11वे अधिशास्ता जिनका जीवन मानव मात्र के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन गया। जिनका विलक्षण व्यक्तित्व और ओजस्वी वाणी का प्रवाह निराशा मुक्ति का साधन बन गया। जिनका शांत आभामंडल दुःख और तमस के अंधियारो में उजाला बन गया।
उस महातपस्वी महामानव का संक्षिप्त जीवन परिचय:-
जन्म- राजस्थान के सरदारशहर में श्री झूमर मलजी और श्रीमती नेम देवी के यहाँ वेशाख शुक्ल 9 वि.स.2019 के दिन एक बालक का जन्म नाम रखा मोहन।
वैराग्य भाव:-तेरापंथ मनीषी मंत्री मुनि श्री सुमेरमल जी स्वामी का वि.स.2030 2031 का चातुर्मास सरदार शहर में बालक मोहन के लिए कठोती में गंगा सामान हुआ। वि.स. 2030 भद्रव शुक्ल षष्ठी का दिन मुनि श्री सुमेरमल जी की प्रेरणा से नव दीप जला और आजीवन विवाह न करने का त्याग। प्रतिक्रमण के आदेश के पश्चात आचार्य श्री तुलसी के निर्देशानुसार मुनि श्री सुमेरमल जी ने वैशाख शुक्ल 14वि.स.2031 को वैरागी मोहन और वैरागी हीरालाल की दीक्षा का आदेश।
दीक्षा-वैशाख शुक्ल 14 ( 5मई 1974) को सरदार शहर में गधेया जी के नोहरे में हजारो की उपस्थिति में मुनि श्री सुमेरमल जी ने दीक्षा प्रदान की। नाम रखा मुनि श्री मुदित कुमार।
गुरु दर्शन-सरदारशहर चातुर्मास की परिसम्पन्नता पर श्री डूंगरगढ़ में आचार्य श्री तुलसी के दीक्षा बाद प्रथम बार दर्शन । गुरु की सेवा का अवसर-वि.स. 2041 ज्येष्ठ शुक्ल 8 को लाडनू में गुरुदेव तुलसी ने पंचमी समिति की पात्री की जिम्मेदारी के साथ ही मुनि मुदित की गुरुदेव की व्यक्तिगत सेवा में नियुक्ति। लगभग 12वर्षो तक पात्री का ये सौभाग्य मुनि मुदित को मिला।
अन्तरंग सहयोगी:-वि.स.2041 माघ शुक्ल7 मर्यादा महोत्सव का सुअवसर उदयपुर के विशाल जन भेद्नी के समक्ष मुनि मुदित को युवाचार्य श्री महाप्रज्ञजी का अन्तरंग सहयोगी बनाया गया।
साझपति- वि.स.2043वैशाख शुक्ल 4 ब्यावर का तेरापंथ भवन में गुरुदेव तुलसी ने मुनि मुदित को साझपति बनाया। महाश्रमण-वि.स.2046 भाद्रपद शुक्ल 9 योगक्षेम वर्ष का आयोजन लाडनू जैन विश्व भारती सुधर्मा सभा में आचार्य श्री तुलसी ने मुनि मुदित कुमारजी को महाश्रमण अलंकरण प्रदान किया।
अनोखा उपहार-वि.स.2047 मार्गशीष माह में सिवांची मालानी की यात्रा के बाद आचार्य श्री तुलसी ने अनोखा उपहार दिया जो महाश्रमण के समर्पण और तुलसी के विश्वास का रूप बना। गुरुदेव् ने फ़रमाया की "यदि कोई कह दे की मुनि मुदित सुविधावादी बन गए या मेरे ध्यान में कोई सुविधावादी प्रवर्ति आती हे तो मुनि मुदित को 3 घंटे खड़े खड़े स्वाध्याय करना होगा।" पर एसा कभी नहीं हुआ।
पुनः महाश्रमण पद-वि.स.2051 माघ शुक्ल 6 को देल्ही में आयोजित आचार्य श्री महाप्रज्ञ पदाभिषेक समारोह में आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के अन्तरंग सहयोगी के रूप में पुनः महाश्रमण बनाया गया।
युवाचार्य पद-वि.स.2054 भद्रव शुक्ल 12 को चोपड़ा हाई स्कूल गंगाशहर के विशाल प्रागंण में अपार जनता के मध्य आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने मुनि श्री महाश्रमण को युवाचार्य पद पर शोभित किया।
महाश्रमिक महातपस्वी-10अगस्त2007 उदयपुर में युवाचार्य श्री की श्रम साधना और अनात्रंग तप का मूल्या्कन करते हुए आचार्य श्री महाप्रज्ञजी ने आपश्री को महाश्रमिक और महातपस्वी का संबोधन प्रदान किया। पूज्य प्रवर ने कहा "आज से लोग इन्हें युवा मनीषी कहे न कहे महातपस्वी महाश्रमण अवश्य कहे।"
आचार्य पद-9 मई 2010 सरदार शहर की पवित्र भूमि पर दोहपर को लगभग 2 बज का 10-12मिनिट पर तेरापंथ का दशम सूर्य अस्त हो गया। आचार्य श्री महाप्रज्ञजी की आत्मा इस लोक को छोड़ दुसरे लोक की यात्रा पर गतिमान हो गई। भिक्षु शासन की मर्यादा के अनुसार एक आचार्य के दिवंगत होते ही स्वतः युवाचार्य आचार्य बन जाते है। पदाभिषेक पर्व-23 मई2010 गाँधी विद्या मंदिर सरदारशहर के विशाल प्रांगन में चतुर्विध धर्म संघ ने अपने एकादश अधिशास्ता के पदाभिषेक पर्व वर्धापन समारोह आयोजित किया। जन्म दीक्षा और आचार्य पद एक ही भूमि पर सम्पादित हुए सरदारशहर की पावन भूमि। आचार्य श्री महाश्रमण जी को पट्टासीन होने का अनुरोध करते हुए साध्वी प्रमुखाश्रीजी ने कहा
"आहिस्ते से उठो आर्यवर! पट्टासीन बनो मंगल पल,
सविनय बद्धांजलि शुभसंशा,महाप्रज्ञ आसन हो अविचल।।"
पट्टासीन होने के पश्चात् वयोवृद्ध संत मुनि श्री सुमेरमल जी "सुदर्शन" ने दायित्व की प्रतिक पञ्च सवस्तिमय अमल धवल पचेवडी ओढ़ा कर आचार्य पदाभिषेक की महत्वपूर्ण विधि सम्पादित की । 
लेखक - उत्तम जैन (विद्रोही )
संपादक - विद्रोही आवाज़
मो - 84607 83401 

सोमवार, 3 सितंबर 2018

क्रांतिकारी मुनि तरुण सागर जी जीवनी व अवदान

             क्रांतिकारी मुनि तरुण सागर जी जीवनी व अवदान 


तुम्हारी वजह से कोई इ्ंसान दुखी रहे अगर तुम्हारी वजह से कोई इ्ंसान दुखी रहे तो समझ लो ये तुम्हारे लिए सबसे बड़ा पाप है, ऐसे काम करो कि लोग तुम्हारे जाने के बाद दुखी होकर आसूं बहाए तभी तुम्हें पुण्य मिलेगा।

जैन मुनि तरुण सागर जी 1 सितंबर 2018  शनिवार को निधन हो गया। 20 दिन पहले उन्हें पीलिया होने के बाद दिल्ली के मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उनका इलाज चल रहा था लेकिन उनकी सेहत में सुधार नहीं हुआ। कुछ दिन से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। 
मुनि श्री तरुण सागर जी महाराज का परिचय --- 
पूर्व नाम : श्री पवन कुमार जैन 

जन्म तिथि : २६ जून, १९६७, 
ग्राम : गुहजी (जि.दमोह ) म. प्र.
माता-पिता : महिलारत्न  श्रीमती शांतिबाई जैन व  श्रेष्ठ श्रावक श्री प्रताप चन्द्र जी जैन 
लौकिक शिक्षा : माध्यमिक शाला तक 
गृह - त्याग :८ मार्च , १९८१
शुल्लक दीक्षा : १८ जनवरी , १९८२, अकलतरा ( छत्तीसगढ़) में
मुनि- दीक्षा : २० जुलाई, १९८८, बागीदौरा (राज.) 
दीक्षा गुरु : यूगसंत आचार्य पुष्पदंत सागर जी 
लेखन : हिन्दी
बहुचर्चित कृति : मृत्यु- बोध
मानद-उपाधि : 'प्रज्ञा-श्रमण (आचार्यश्री पुष्पदंत सागरजी द्वारा प्रदत)
प्रख्यायती : क्रांतिकारी संत कीर्तिमान : आचार्य भगवंत कुन्दकुन्द के पश्चात गत 2000 वर्षो के इतिहास मैं मात्र १३ वर्स की वय में जैन
सन्यास धारण करने वाले प्रथम योगी |
रास्ट्र के प्रथम मुनि जिन्होंने लाल किले दिल्ली से सम्बोधन .टी.वी. के माध्यम से भारत सहित १२२ देशों में महावीर - वाणी ' के विश्व -व्यापी प्रसारन की ऐतिहासिक सुरुआत करने का प्रथम श्रेय 

मुख्य - पत्र : अहिंसा - महाकुम्भ (मासिक) 
आन्दोलन : कत्लखानों और मांस -निर्यात के विरोध में निरंतर
अहिंसात्मक रास्ट्रीय आन्दोलन 

सम्मान : ६ फरवरी ,२००२ को म.प्र. शासन द्वारा' राजकीय अतिथि ' का दर्जा
२ मार्च , २००३ को गुजरात सरकार द्वारा ' राजकीय अतिथि 'का सम्मान 

साहित्य :तीन दर्जन से अधिक पुस्तके उपलब्ध और उनका हर वर्ष दो लाख प्रतियो का प्रकाशन 
रास्ट्रसंत : म. प्र. सरकार द्वारा २६ जनवरी , २००३ को दशहरा मैदान , इन्दोर में
संगठन : तरुण क्रांती मंच .केन्द्रीय कार्यालय दिल्ली में देश भर में इकाईया
प्रणेता : तनाव मुक्ति का अभिनव प्रयोग ' आंनंद- यात्रा ' कार्यक्रम के प्रणेता 
पहचान : देश में सार्वाधिक सुने और पढ़े जाने वाले तथा दिल और दिमाग को झकजोर देने
वाले अधभुत .प्रवचन
अपनी नायाब प्रवचन शैली के लिए देसभर में विखाय्त जैन मुनि के रूप में पहचान
मिशन : भगवान महावीर और उनके सन्देश " जियो और जीने दो " का विश्व व्यापी प्रचार प्रसार एवम जीवन जीने की .... 

गुलाब कांटों में भी हंसता है गुलाब कांटों में भी हंसता है इसलिए लोग उसे प्रेम करते हैं, तुम भी ऐसे काम करो कि तुमसे नफरत करने वाले लोग भी तुमसे प्रेम करने पर विवश हो जायें।
कड़वे प्रवचनों की वजह से ही क्रांतिकारी संत कहा जाता था :  ‘‘मुनिश्री अपने कड़वे प्रवचनों के लिए प्रसिद्ध रहे। इसी वजह से उन्हें क्रांतिकारी संत भी कहा जाता था। वहीं, कड़वे प्रवचन नामक उनकी पुस्तक काफी प्रचलित है। समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट करने में उन्‍होंने काफी प्रयास किए।’’ मुनिश्री मध्यप्रदेश और हरियाणा विधानसभा में प्रवचन भी दे चुके थे।   
कड़वे वचन ---- 
1. हंसते मनुष्य हैं कुत्ते नहीं

हंसने का गुण सिर्फ मनुष्यों को प्राप्त है इसलिए जब भी मौका मिले जी खोल कर मुस्कुराइए। कुत्ते चाहकर भी नहीं मुस्कुरा सकते हैं। 

2. किसी को बदल नहीं सकते हैं
परिवार में आप किसी को बदल नहीं सकते हैं लेकिन आप अपने आप को बदल सकते हैं, आप पर ही आपका पूरा अधिकार है। 
3. कन्या भ्रूण हत्या
जिनकी बेटी ना हो उन्हें चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए और जिस घर में बेटी ना हो वहां शादी ही नहीं करनी चाहिए। जिस घर में बेटी ना हो उस घर से साधु-संतों को भिक्षा भी नहीं लेनी चाहिए। 
4. धर्म पति तो राजनीति पत्नी
राजनीति को धर्म से ही हम नियंत्रित करते हैं। अगर धर्म पति है तो राजनीति पत्नी। जिस तरह अपनी पत्नी को सुरक्षा देना हर पति का कर्तव्य होता है वैसे ही हर पत्नी का धर्म होता है कि वो पति के अनुशासन को स्वीकार करे। ठीक ऐसा ही राजनीति और धर्म के बीच होना चाहिए। क्योंकि बिना अंकुश के हर कोई बेलगाम हाथी की तरह होता है। 
5. आपके नोट नहीं खोट चाहिए
मैं आपकी गलत धारणाओं पर बुलडोजर चलाऊंगा। आज का आदमी बच्चों को कम, गलत धारणाओं को ज्यादा पालता है। इसलिए वह खुश नहीं है। इसलिए मुझे आपके नोट नहीं, आपके खोट चाहिए। 
6. दूसरे की प्रार्थना किसी काम की नहीं
तुम्हारी वजह से जीते जी किसी की आंखों में आंसू आए तो यह सबसे बड़ा पाप है। लोग मरने के बाद तुम्हारे लिए रोए, यह सबसे बड़ा पुण्य है। इसीलिए जिंदगी में ऐसे काम करो कि, मरने के बाद तुम्हारी आत्मा की शांति के लिए किसी और को प्रार्थना नहीं करनी पड़े। क्योंकि दूसरों के द्वारा की गई प्रार्थना किसी काम की नहीं है। 
लाल किले से प्रवचन
2000 में जैन मुनि तरुण सागर ने लाल किले से प्रवचन दिया था
2000 में हरियाणा, 2001 में राजस्थान, 2002 में मध्य प्रदेश से भी प्रवचन दिया
2003 में गुजरात और 2004 में महाराष्ट्र में भी प्रवचन दिया
प्रगतिशील जैन मुनि का दर्जा
2006 में कर्नाटक के बेलगावी से 65 दिन की पैदल यात्रा करने के बाद तरुण सागर श्रवणबेलगोला में महा मस्तक अभिषेक समारोह में पहुंचे। हिंसा, भ्रष्टाचार और रूढ़िवाद की आलोचना के चलते उन्हें प्रगतिशील जैन मुनि का दर्जा मिला। इसके बाद उनके भाषणों को कड़वे प्रवचन कहा जाने लगा। 
2012 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें तरुण क्रांति पुरस्कार से सम्मानित किया
तरुण सागर को उनके कड़वे प्रवचनों के लिए जाना जाता था। वे अपने अनुयायियों को जो प्रवचन देते थे उन्हें कड़वे प्रवचन कहते थे। इन प्रवचनों में तरुण सागर समाज में मौजूद कई बुराइयों की तीखे शब्दों में आलोचना करते थे। उनके प्रवचनों की किताब भी ‘कड़वे प्रवचन’ नाम से प्रकाशित की जाती है।
जैन मुनि तरुण सागर के ग्रहस्थ जीवन की खास बातें--- 
जैन मुनि की बहन माया जैन ने बताया कि तरुण सागर बचपन से ही धार्मिक थे। शरारत के साथ-साथ धर्म में उनकी बचपन से आस्था रही है। आचार्य विद्यासागर से ब्रह्मचर्य की दीक्षा लेने के बाद वह वापस पीछे मुड़कर नहीं देखा। आचार्य पुष्पदंग सागर ने उन्हें मुनि दीक्षा दी। तभी से वह जनसंत बन चुके थे। भगवान महावीर के आदर्शों पर चलते हुए मुनि तरुण सागर ने समाज को नई दिशा दिखाने का काम किया है। उनके ग्रहस्थ जीवन के परिवार में 4 भाई 3 बहन हैं। 

शनिवार, 18 अगस्त 2018

श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी जीवन परिचय

अटल बिहारी वाजपेयी (जन्म: २५ दिसंबर, १९२४) भारत के पूर्व प्रधानमंत्री हैं। वे पहले १६ मई से १ जून १९९६ तथा फिर १९ मार्च १९९८ से २२ मई २००४ तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। वे हिन्दी कवि, पत्रकार व प्रखर वक्ता भी हैं। वे भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले महापुरुषों में से एक हैं और १९६८ से १९७३ तक उसके अध्यक्ष भी रहे। वे जीवन भर भारतीय राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प लेकर प्रारम्भ किया था और देश के सर्वोच्च पद पर पहुँचने तक उस संकल्प को पूरी निष्ठा से निभाया। वाजपेयी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार के पहले प्रधानमन्त्री थे जिन्होंने गैर काँग्रेसी प्रधानमन्त्री पद के 5 साल बिना किसी समस्या के पूरे किए। उन्होंने 24 दलों के गठबंधन से सरकार बनाई थी जिसमें 81 मन्त्री थे। कभी किसी दल ने आनाकानी नहीं की। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता का पता चलता है।
आरम्भिक जीवन:-
अटल जी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ब्रह्ममुहर्त में ग्वालियर में हुआ था। मान्यता अनुसार पुत्र होने की खुशी में जहाँ घर में फूल की थाली बजाई जा रही थी तो वहीँ पास के गिरजाघर में घंटियों और तोपों की आवाज के साथ प्रभु ईसामसीह का जन्मदिन मनाया जा रहा था। शिशु का नाम बाबा श्यामलाल वाजपेयी ने अटल रखा था। माता कृष्णादेवी दुलार से उन्हे अटल्ला कहकर पुकारती थीं। पिता का नाम पं. कृष्ण बिहारी वाजपेयी था। वे हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी तीनो भाषा के विद्वान थे। पं. कृष्णबिहारी वाजपेयी ग्वालियर राज्य के सम्मानित कवि थे। उनके द्वारा रचित ईश प्रार्थना राज्य के सभी विद्यालयों में कराई जाती थी। जब वे अध्यापक थे तो डॉ. शिवमंगल सिहं सुमन उनके शिष्य थे। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि अटल जी को कवि रूप विरासत में मिला है।
राजनीतिक जीवन:-
ग्वालियर के आर्य कुमार सभा से उन्होंने राजनैतिक काम करना शुरू किये, वे उस समय आर्य समाज की युवा शक्ति माने जाते थे और 1944 में वे उसके जनरल सेक्रेटरी भी बने। 1939 में एक स्वयंसेवक की तरह वे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गये. और वहा बाबासाहेब आप्टे से प्रभावित होकर, उन्होंने 1940-44 के दर्मियान आरएसएस प्रशिक्षण कैंप में प्रशिक्षण लिया और 1947 में आरएसएस के फुल टाइम वर्कर बन गये. विभाजन के बीज फैलने की वजह से उन्होंने लॉ की पढाई बीच में ही छोड़ दी। और प्रचारक के रूप में उन्हें उत्तर प्रदेश भेजा गया और जल्द ही वे दीनदयाल उपाध्याय के साथ राष्ट्रधर्म (हिंदी मासिक ), पंचजन्य (हिंदी साप्ताहिक) और दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे अखबारों के लिये काम करने लगे. वाजपेयी ने कभी शादी नही की। वे जीवन भर कुवारे ही रहे।
अटल बिहारी वाजपेयी भारत के 10 वे पूर्व प्रधानमंत्री थे. वे पहले 1996 में 13 दिन तक और फिर 1998 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री बने रहे। वे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता थे । भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के बाहर के इंसान होते हुए भारत की पांच साल तक सेवा करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री थे।
वाजपेयी की राजनैतिक यात्रा की शुरुआत एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में हुई। 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में भाग लेने के कारण वह अन्य नेताओं के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। इसी समय उनकी मुलाकात श्यामा प्रसाद मुखर्जी से हुई, जो भारतीय जनसंघ यानी बी.जे.एस. के नेता थे। उनके राजनैतिक एजेंडे में वाजपेयी ने सहयोग किया। स्वास्थ्य समस्याओं के चलते मुकर्जी की जल्द ही मृत्यु हो गई और बी.जे.एस. की कमान वाजपेयी ने संभाली और इस संगठन के विचारों और एजेंडे को आगे बढ़ाया। सन 1954 में वह बलरामपुर सीट से संसद सदस्य निर्वाचित हुए। छोटी उम्र के बावजूद वाजपेयी के विस्तृत नजरिए और जानकारी ने उन्हें राजनीति जगत में सम्मान और स्थान दिलाने में मदद की। 1977 में जब मोरारजी देसाई की सरकार बनी, वाजपेयी को विदेश मंत्री बनाया गया। दो वर्ष बाद उन्होंने चीन के साथ संबंधों पर चर्चा करने के लिए वहां की यात्रा की। भारत पाकिस्तान के 1971 के युद्ध के कारण प्रभावित हुए भारत-पाकिस्तान के व्यापारिक रिश्ते को सुधारने के लिए उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा कर नई पहल की। जब जनता पार्टी ने आर.एस.एस. पर हमला किया, तब उन्होंने 1979 में मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। सन 1980 में भारतीय जनता पार्टी की नींव रखने की पहल उनके व बीजेएस तथा आरएसएस से आए लालकृष्ण आडवाणी और भैरो सिंह शेखावत जैसे साथियों ने रखी। स्थापना के बाद पहले पांच साल वाजपेयी इस पार्टी के अध्यक्ष रहे।
प्रधानमंत्री के रूप में अटल का कार्य:-
जनता के बीच प्रसिद्द अटल बिहारी वाजपेयी अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते थे। 13 अक्टूबर 1999 को उन्होंने लगातार दूसरी बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नई गठबंधन सरकार के प्रमुख के रूप में भारत के प्रधानमंत्री का पद ग्रहण किया। वे 1996 में बहुत कम समय के लिए प्रधानमंत्री बने थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद वह पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो लगातार दो बार प्रधानमंत्री बने। वरिष्ठ सांसद श्री वाजपेयी जी राजनीति के क्षेत्र में चार दशकों तक सक्रिय रहे। वह लोकसभा (लोगों का सदन) में नौ बार और राज्य सभा (राज्यों की सभा) में दो बार चुने गए जो अपने आप में ही एक कीर्तिमान है। भारत के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्री, संसद की विभिन्न महत्वपूर्ण स्थायी समितियों के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने आजादी के बाद भारत की घरेलू और विदेश नीति को आकार देने में एक सक्रिय भूमिका निभाई।
अटलजी प्रधानमंत्री के रूप में यक़ीनन बेहद योग्य व्यक्ति रहे हैं और नेहरूजी ने अपने जीवनकाल में ही यह घोषणा कर दी थी तथापि आडवाणी जी को इस बात का श्रेय अवश्य दिया जाना चाहिए कि उन्होंने अटल जी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया। आडवाणी जी के इस अथक श्रम को निश्चय ही याद किया जाएगा कि उन्होंने अटल जी के लिए समर्थन जुटाया। भाजपा की हिन्दुत्ववादी नीति से वोट बटोरने का कार्य भी उन्होंने किया था। राजनीति में स्थायी मित्रता और शत्रुता का कोई भी स्थान नहीं होता। प्रधानमंत्री बनने के बाद अटलजी के सामने सम्पूर्ण देश और उसकी समस्याएँ थीं। वह भाजपा तक सीमित नहीं रह सकते थे। वह संवैधानिक मर्यादा से बंधे हुए थे। यों भी अटलजी नैतिक व्यक्ति रहे हैं। इसके अलावा एन. डी. ए. के प्रति भी उनका उत्तरदायित्व था। आडवाणी जी चाहते थे कि राम मन्दिर का मसला सुलझा लिया जाए। लेकिन अटल जी जानते थे कि एन. डी. ए. में शामिल अन्य दल इसके लिए तैयार नहीं होंगे। वह विवादास्पद प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते थे। वह दूरगामी परिणामों का आकलन कर रहे थे। यही कारण है कि आडवाणी जी के साथ उनके वैचारिक मतभेद हो गए।
अटल जी की दो प्रसिद्ध कविताएं- परिचय और आवाहन के साथ युवा अटल की श्याम-श्वेत छवि वाला राष्ट्रधर्म के प्रथम अंक का मुखपृष्ठ है, इसके पश्चात पाञ्चजन्य के अप्रैल 1950 अंक का मुखपृष्ठ छपा है जिसका संपादन भी अटल जी ने किया था। मुख्य रूप से इस विशेषांक में कुल 96 पृष्ठों में छोटे-बड़े लगभग 40 लेख और 4 कविताएं संकलित हैं। संपादकीय से पूर्व उस समय के शीर्ष साहित्यकार पं. श्रीनारायण चतुर्वेदी को अटल जी द्वारा लिखा पत्र प्रकाशित है। इसके पश्चात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को समर्पित अटल जी द्वरा रचित कविता है।
संपादक ने अपनी संपादकीय टिप्पणी में अटल जी की प्रतिभा का प्रसंग लेते हुए कहा है- '1957 के सामान्य-निर्वाचन में बलरामपुर (उ.प्र.) क्षेत्र से जीतकर जब अटल जी पहली बार लोकसभा पहुंचे तो सदन में पहली बार बोलते ही प्रधानमंत्री नेहरू जी उनकी वक्तृता से इतने प्रभावित हुए कि जब जॉन फिट्जराल्ड कैनेडी अमरीका के राष्ट्रपति के चुनाव में खड़े हुए, तो उनके साथ वहां की निर्वाचन-प्रणाली को समझने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी के किसी सदस्य को भेजने के बजाय जनसंघ के अटल जी को भेजा। शायद नेहरू जी को तभी उस युवक अटल बिहारी वाजपेयी में भारत के भावी प्रधानमंत्री बनने की योग्य-क्षमता की झलक मिल गयी थी।
पुरस्कार:-
1.१९९२: पद्म विभूषण।
2.१९९३: डी लिट (कानपुर विश्वविद्यालय)।
3.१९९४: लोकमान्य तिलक पुरस्कार।
4.१९९४: श्रेष्ठ सासंद पुरस्कार।
5.१९९४: भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार।
6.२०१४ दिसम्बर : भारत रत्न से सम्मानित।
7.२०१५ : डी लिट (मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय)।
8.२०१५ : 'फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड', (बांग्लादेश सरकार द्वारा प्रदत्त)।
9.२०१५ : भारतरत्न से सम्मानित।
कविता संग्रह:-
1.क़दम मिला कर चलना होगा ।
2.हरी हरी दूब पर। 
3.कौरव कौन, कौन पांडव ।
4.दूध में दरार पड़ गई ।
5.क्षमा याचना ।
6.मनाली मत जइयो ।
7.पुनः चमकेगा दिनकर ।
8.अंतरद्वंद्व ।
9.जीवन की ढलने लगी साँझ ।
10.मौत से ठन गई ।
11.मैं न चुप हूँ न गाता हूँ ।
12.एक बरस बीत गया ।
13.आओ फिर से दिया जलाएँ ।
विचार:-
1.आज परस्पर वैश्विक निर्भरता का मतलब है कि विकासशील देशों में आर्थिक आपदायें, विकसित देशों पर एक प्रतिक्षेप पैदा कर सकता है।
2.आप दोस्तों को बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसियों को नहीं।
3.किसी भी देश को खुले आम आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक गठबंधन के साथ साझेदारी, सहायता, उकसाना और आतंकवाद प्रायोजित करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
4.गरीबी बहुआयामी है यह पैसे की आय से परे शिक्षा, स्वास्थ्य की देखरेख, राजनीतिक भागीदारी और व्यक्ति की अपनी संस्कृति और सामाजिक संगठन की उन्नति तक फैली हुई है।
5.जो लोग हमें यह पूछते हैं कि हम कब पाकिस्तान के साथ वार्ता करेंगे, वे शायद इस तथ्य से वाकिफ नहीं हैं कि पिछले 55 वर्षों में पाकिस्तान के साथ बातचीत के लिए हर बार पहल भारत ने ही किया है।
6.जैव विविधता सम्मेलन से दुनिया के गरीबों के लिए कोई भी ठोस लाभ नहीं निकला है।
दोस्तों, पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी भारत माता के एक ऐसे सपूत थे , जिन्होंने स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात भी अपना जीवन देश और देशवासियों के उत्थान एवं कल्याण हेतु जीया तथा जिनकी वाणी से असाधारण शब्दों को सुनकर आम जन उल्लासित होते रहे और जिनके कार्यों से देश का मस्तक ऊंचा हुआ. मघ्य प्रदेश के ग्वालियर में एक ब्राह्मण परिवार में 25 दिसंबर, 1924 को इनका जन्म हुआ. पुत्रप्राप्ति से हर्षित पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी को तब शायद ही अनुमान रहा होगा कि आगे चलकर उनका यह नन्हा बालक सारे देश और सारी दुनिया में नाम रौशन करेगा.

इन्होंने ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज - जो अब लक्ष्मीबाई कॉलेज कहलाता है - में तथा कानपुर उ. प्र. के डी. ए. वी. कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की और राजनीति विज्ञान में एम. ए.की उपाधि प्राप्त की. सन् 1993 मे कानपुर विश्वविद्यालय द्वारा दर्शन शास्त्र में पी.एच डी की मानद उपाधि से सम्मानित किए गए.

भारतीय स्वातंत्र्य-आंदोलन में सक्रिय योगदान कर 1942 में जेल गए. वाजपेयी जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सदस्य और सन् 1951 में गठित राजनैतिक दल ‘भारतीय जनसंघ’ के संस्थापक सदस्य थे. सन् 1966-67 सरकारी प्रत्याभूतियों की समिति के अघ्यक्ष, सन् 1967 से 70 तक लोक लेखा समिति के अघ्यक्ष रहे. सन् 1968 से 73 तक वे भारतीय जनसंघ के अघ्यक्ष थे. सन् 1975-77 के दौरान आपातकाल में बंदी रहे. 1977 से 79 तक भारत के विदेश  मंत्री, सन् 1977 से 80 तक जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य, सन् 1980-86 भाजपा अघ्यक्ष, सन् 1980-84 , 1986 तथा 1993-96 के दौरान भाजपा संसदीय दल के नेता रहे. सन् 1957 में दूसरी लोकसभा के लिए प्रथम बार निर्वाचित हुए. तब से 2004 में 14वीं लोकसभा हेतु हुए संसदीय आम चुनाव तक ये  उत्तर प्रदेश  में लखनऊ से प्रत्याशी  होकर निर्वाचित होते रहे. सन् 1962-67 और 1986-91 के दौरान आप राज्य सभा के सम्मानित सदस्य थे और सन् 1988 से 89 तक सार्वजनिक प्रयोजन समिति के सदस्य. ये  सन् 1988-90 में संसद् की सदन समिति तथा व्यापारिक परामर्श समिति के सदस्य रहे. सन् 1990-91 में याचिका समिति के अघ्यक्ष बने और सन् 1993 से 1996 तक तथा 1997 -98 में विदेश नीति समिति के अघ्यक्ष रहे. सन् 1993-96 और 1996-97 में  लोक सभा में प्रतिपक्ष के नेता थे. सन् 1999 में लोक सभा में भाजपा संसदीय दल के नेता और सन् 2004 में भाजपा और एनडीए संसदीय दल के अघ्यक्ष रहे.

भारत के बहुदलीय लोकतंत्र में ये  ऐसे एकमात्र राजनेता हैं, जो प्रायः सभी दलों को स्वीकार्य रहे. इनकी  विशेषता  के कारण ये  16 मई, 1996 से 31 मई, 1996 तथा 1998 - 99 और 13 अक्तूबर, 1990 से मई, 2004 तक तीन बार भारत के प्रधानमंत्री रहे. भारत की संस्कृति, सभ्यता, राजधर्म, राजनीति और विदेश नीति की इनको  गहरी समझ है. बदलते राजनैतिक पटल पर गठबंधन सरकार को सफलतापूर्वक बनाने, चलाने और देश को विश्व में एक शक्तिशाली गणतंत्र के रूप में प्रस्तुत कर सकने की करामात इन जैसे करिश्माई नेता के बूते की ही बात थी. प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में जहां इन्होंने पाकिस्तान और चीन से संबंध सुधारने हेतु अभूतपूर्व कदम उठाए वहीं अंतर राष्ट्रीय दवाबों के बावजूद गहरी कूटनीति तथा दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए  पोकरण में परमाणु विस्फोट किए तथा कारगिल-युद्ध जीता.

राजनीति में दिग्गज राजनेता, विदेश नीति में संसार भर में समादृत कूटनीतिज्ञ, लोकप्रिय जननायक और कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ ये  एक अत्यंत सक्षम और संवेदनशील कवि, लेखक और पत्रकार भी रहे हैं. विभिन्न संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य और विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्री के रूप में इन्होंने  विश्व के अनेक देशों की यात्राएं की हैं और भारतीय कुटनीति तथा विश्वबंधुत्व का घ्वज लहराया है. राष्ट्र धर्म (मासिक), पाञ्चजन्य (साप्ताहिक), स्वदेश (दैनिक), और वीर अर्जुन (दैनिक), पत्र-पत्रिकाओं के आप संपादक रह चुके हैं. विभिन्न विषयों पर इनके द्वारा  रचित अनेक पुस्तकें और कविता संग्रह प्रकाशित हैं.आजीवन अविवाहित, अद्भुत व्यक्तित्व के घनी श्री वाजपेयी पढ़ने -लिखने, सिनेमा देखने, यात्राएं करने और खाना पकाने-खाने के शौकीन हैं. देश की आर्थिक उन्नति, वंचितों के उत्थान और महिलाओं तथा बच्चों के कल्याण की चिंता उन्हें हरदम रहती है. राष्ट्र सेवा हेतु राष्ट्रपति द्वारा पद्म विभूषण से अलंकृत श्री वाजपेयी 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार और सर्वोत्तम सांसद के भारतरत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पंत पुरस्कार आदि अनेक पुरस्कारों, सम्मानों से विभूषित तथा सम्मानित हैं. कई प्रतिष्टित संस्थाओं-संगठनों और समितियों के आप सम्मानित सदस्य थे.


गुरुवार, 9 अगस्त 2018

बाल गंगाधर तिलक

       बाल गंगाधर तिलक की जीवनी - संकलन उत्तम जैन ( विद्रोही )

                  


लोकमान्य तिलक भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के उन अमर तथा श्रेष्ठ बलिदानियों में गिने जाते हैं, जो अपनी उग्रवादी चेतना, विचारधारा, साहस, बुद्धि व अटूट देशभक्ति के लिए जाने जाते हैं । उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व एक ऐसे संघर्ष की कहानी है, जिसने भारत में एक नये युग का निर्माण किया ।

भारतवासियों को एकता और संघर्ष का ऐसा पाठ सिखाया कि वे स्वराज्य हेतु संगठित हो उठे । वे एक राजनेता ही नहीं, महान् विद्वान, दार्शनिक भी थे । स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है का नारा बुलन्द करने वाले तिलक स्वाधीनता के पुजारी थे ।
जीवनी ------ 
बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) का जन्म 23 जुलाई 1856 ई. को महाराष्ट्र के पश्चिमी किनारे पर स्थित रत्नागिरी में हुआ था | उनके पिता संस्कृत के पंडित थे और माता तपस्विनी थी | पुत्र के लिए तिलक जी की माता ने सूर्य भगवान की पूजा की थी | तिलक का जन्म का नाम था केशव पर प्यार से उन्हें सब बाल कहते थे | आगे चलकर उनका यही नाम प्रसिद्ध हुआ | बचपन में स्कूल में ही उनकी प्रखर बुद्धिमता फलक उठी | उनके पिता ने उन्हें संस्कृत पढाई | तिलक को गणित विषय भी प्रिय था |
कक्षा के अध्यापक सवाल हल करने को देते तो वे उसे कागज पर न लिखकर जबानी ही उत्तर देते थे | परीक्षा में भी कठिन सवाल ही हल करते थे बाकि वैसे भी छोड़ देते थे | सवाल करने की इस अजीब पद्धति के कारण के शिक्षक से उनका झगड़ा भी हो गया | सारे अध्यापक उन्हें तेज और बुद्धिमान विद्यार्थी मानते थे | कॉलेज के प्रथम वर्ष में उन्होंने अपना स्वास्थ्य सुधारने का बीड़ा उठाया | कॉलेज की पढाई की ओर उदासीन होकर उन्होंने अपना व्यायाम और तैरने का शौक पूरा किया | वहां भी सबको उनके स्वभाव का परिचय मिला | किसी भी विषय का अभ्यास करने की तिलक की पद्धति अनोखी थी | जिस विषय का अभ्यास करना होता , उसका वह हर दृष्टिकोण से हर पहलू से सर्वागीण विकास करते थे |
वकालत पढ़ते समय कॉलेज में भोपाल गणेश आगरकर नामक एक युवक से उनकी मित्रता हो गयी | केवल किताबी पढाई से ही नही देश की स्तिथि पर रात-दिन विचार करने में इन दोनों मित्रो का समय कटता था | देश की स्थिति सुधारने के लिए क्या क्या करना चाहिए , इस विषय पर दोनों में वाद विवाद होता रहता था | वे अनुभव करते थे कि देश की स्तिथि में परिवर्तन लाना हो तो देश के लिए जीवन होम करने वाले लोग चाहिए | दोनों ने सरकारी नौकरी न कर देशसेवा करने की प्रतिज्ञा की | आगरकर बहुत गरीब थे | उनकी माँ आस लगाये बैठी थी कि बेटे की शिक्षा पुरी होगी और वह नौकरी करने लगेगा | तिलक के आत्मीय भी उनके वकील या न्यायाधीश बनने की आशा करते थे किन्तु दोनों ने देशसेवा का मार्ग अपनाया |

उस जमाने में सुशिक्षित लोगो को सरकारी नौकरी की लालच होती थी और कई लोग तो केवल इसी लालच में शिक्षा ग्रहण करते थे किन्तु तिलक और आगरकर ने अपनी शिक्षा का उपयोग समाज सुधार के लिए करने का निश्चय किया | इसी समय पूना के सामाजिक कायकर्ता न्यायमूर्ति रानाडे की सरकारी नौकरी छोडकर शिक्षण के लिए पूना आते हुए विष्णु शास्त्री चिपलूनकर से पहचान हो गयी | तिलक ,चिपलूनकर और आगरकर तीनो ने पूना में पहले एक स्कूल ,फिर एक कॉलेज शुरू किया | इससे भी शिक्षा को नई दिशा मिली | फिर उन्हें लगा , लोक शिक्षण के लिए एक अखबार भी निकालना चाहिए अत: उन्होंने मराठी में केसरी और अंग्रेजी में मराठा दो साप्ताहिक शुरू किये | इन दो पत्रों ने जनता की शिकायते प्रकट करना शुरू किया |
इस तरह तिलक (Bal Gangadhar Tilak) के सार्वजनिक जीवन का आरम्भ हुआ | अखबार शुरू होने पर उन्हें अनेक विषयों पर लिखना पड़ा | तिलक की कलम बड़ी तेज थी | एक बार उन्होंने एक प्रकरण पर कड़ी आलोचना की | तब उन्हें और आगरकर को 101 दिन के कारावास की सजा मिली | कारावास के समय भी वह देश के संबध में ही सोचा करते थे | वाद-विवाद के जोश में वह इतने जोर से बोला करते थे कि पहरेदार को बार-बार धीरे बोलने के लिए कहना पड़ता  !
तिलक (Bal Gangadhar Tilak) कुछ समय तक प्राध्यापक भी रहे थे | गणित और संस्कृत बहुत ही अच्छी तरह से पढाते थे | तिलक और आगरकर ने प्राध्यापक का काम केवल 40 रूपये वेतन पर किया किन्तु तिलक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने से संतुष्ट नही थे | उन्हें लगता था कि सारा राष्ट्र जाग उठे , ऐसा कुछ करना चाहिए वस्तुत: तिलक की तमन्ना गणित का प्राध्यापक बनने की थी | दिन-रात पढने-लिखने के इच्छुक रहते किन्तु देश में होने वाले अत्याचारों को वह सहन नही कर पा रहे थे | महाराष्ट्र में वासुदेव बलवंत फडके ने अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह किया | कुछ समय तक तिलक ने इस महान क्रांतिकारी की निगरानी में शस्त्राभ्यास किया किन्तु समस्त देश को साथ लेकर कार्य करने का मार्ग खोज रहे थे |
इसी समय महाराष्ट्र में अकाल पड़ा | तिलक (Bal Gangadhar Tilak) ने अपने पत्र में जनता की शिकायते जाहिर की | असंतोष के बीज बोने के लिए यह अच्छा अवसर था अत: तिलक ने कृषको की ओर से आन्दोलन शुरू किया , लेख लिखे अर्जिया भेजी | उन्होंने अपने युवा साथियो को सारे महाराष्ट्र में गाँव-गाँव प्रचार के लिए भेजा | उन्होंने लोगो से कहना शुरू किया कि सरकारी अधिकारियों के साथ निडरता से बर्ताव करे | उन्होंने प्रचार जारी किया “कानून का राज्य है डंडेशाही नही” इस आन्दोलन से कृषक समाज तिलक के पीछे खड़ा हो गया |
बहुत से युवक इनके अनुगामी बने | तिलक और उनके पत्र केसरी ने सरकार को भी प्रभावित किया | लगभग उसी समय महाराष्ट्र में प्लेग की बीमारी आयी | उस समय भी तिलक ने जनता का पक्ष ग्रहण किया | सरकारी अस्पताल या रोगियों के शिविरों की अव्यस्स्था थी कुप्रबंध था | इस पर तिलक ने कड़ी आलोचना की | गाँव के गाँव प्लेग के कारण उजड़ गये किन्तु तिलक गाँवों में ही डटे रहे | खुद घूम घूमकर वह रोगियों की हालत देखा करते | इस प्लेग ने उनके पुत्र की बलि ली किन्तु तिलक का हृदय अडिग रहा | उस दिन उन्होंने शांत चित से केसरी का अग्रलेख लिखा |
पूना में प्लेग के लिए नियुक्त सरकारी अधिकारी बड़ा ही उन्मत्त और अत्याचारी था | लोग उससे चिढ़े हुए थे | भीतर ही भीतर ज्वालामुखी सुलग रहा था | आखिर विस्फोट होकर उस अधिकारी का खून हो गया | तब पुन में पुलिस के अत्याचार आरम्भ हुए | इन जुल्मो पर कड़ा लेख लिख कर “सरकार का दिमाग तो ठिकाने है ?” ऐसा प्रश्न तिलक ने पूछा | इस लेख पर और पहले दिए हुए भाषणों के आधार पर सरकार मुकदमा चलायेगी , यह तो तिलक जानते ही थे | वैसा हुआ भी |
1917 में पुलिस ने राजद्रोह में तिलक (Bal Gangadhar Tilak) को पहली बार गिरफ्तार किया | उन्हें जमानत पर छोड़ने को सरकार तैयार है या नही , यह जानने के लिए उन्होंने अपने मित्र को अधिकारियों के पास भेजा | अधिकारियों से मिलकर उनके मित्र यह बताने के लिए कि उनकी जमानत देने से इंकार कर दिया गया है उनसे मिलने गये | तब तिलक सो गये थे | उन्होंने मित्र से कहा “मुझे तो आशा थी ही नही और मेरा सोने का समय हो गया था अत: सो गया” कितना मनोधैर्य था उनमे | मुकदमे का फैसला हुआ | ढाई साल के श्रमसहित कारावास की सजा मिली | उन्हें राजबंदी नही माना गया | रस्सी आदि साफ़ करने का काम उन्हें दिया गया |
कारागृह का अन्न बड़ा ही खराब होता था | तिलक के कष्ट को देखकर पहरेदार दुखी हुआ | वह अपने घर से गरी , बादाम आदि पौष्टिक पदार्थ लाकर चोरी से उनके कोठरी में डाला करता था | तिलक के मना करने पर भी उसने अपना हठ नही छोड़ा | जेल से छुटते समय तिलक ने उसे घर आकर मिलने को कहा | उस समय तिलक के प्रति सर्वत्र कितना भक्तिभाव बढने लगा था इसका यह छोटा सा उदाहरण है | तिलक इस कारवास से ओर अधिक लोकप्रिय होकर बाहर आये | भारत में तिलक की कीर्ति फ़ैल चुकी थी | लोग आशा से उनके नेतृत्व की ओर आँखे लगाये हुए थे |